गांधी पर विलाप: पर गांधी की राह पर कौन?


प्रसंगश: राजेश सिरोठिया
लोकसभा में प्रज्ञा ठाकुर के खिलाफ महात्मा गांधी के हत्यारे नाथूराम गोडसे को लेकर मचे बवाल में नेता डीएमके नेता ए राजा को भूल गए जिसने देश के महान क्रांतिकारी ऊधम सिंह को गोडसे की तरह हत्यारा बता दिया। गांधी के पैरोकारों को गोडसे के देशभक्त कहे जाने की बात तो चुभी, लेकिन जलियावाला बाग कांड के खलनायक जनरल डायर को बीस साल बाद मारने की कोशिश में लंदन में पकड़े गए और जेल मं जान गवांने वाले ऊधम सिंह को हत्यारे की जमात में खड़ा करने वाले सांसद ए राजा के बयान पर किसी ने ध्यान भी नहीं दिया। न पहले और न अब। वैसे तो संसदीय प्रक्रियाओं का तकाजा तो यह कहता है कि जो शब्द संसद या विधानसभा के स्पीकर विलोपित कर देते हैं उसका प्रसारण या प्रकाशन नहीं हो सकता। लेकिन मोदी व्दारा महात्मा गांधी को अगवा करने की कोशिशों से बौखलाई कांग्रेस ऊधम सिंह के अपमान पर कुछ बोलना ही भूल गई। गांधी और गोडसे के नाम पर विलाप करने वाली  नेता क्या बताएंगे कि उनके स्वयं के और उनकी पार्टी का आचरण क्या गांधी परक है? है तो कितना? सिर्फ गांधी का नाम लगाकर उनके ऊसूलों को दिन रात धज्जियां उड़ाने वालों को गांधी का नाम लेने का भी हक क्या रह गया है? बात सिर्फ कांग्रेस की नहीं भाजपा और उनके प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की भी है। बेशक उन्होंने महात्मा गांधी की 150 वीं सालगिरह पर देश में आयोजन करके उनके नाम को रोशन रखने की कवायद की है। लेकिन गांधी के कामों या गांधीवाद से उनका कितना और क्या लेना देना है। राष्ट्रपिता महात्मा गांधी तो पहले से ही देश ही नहीं विदेशों में भी पूजे जाते हैं। हाल ही महाराष्ट्र के घटनाक्रम को ही ले लीजिए। वहां गांधी के नाम की पैरोकारी करने वाली कांग्रेस ने गांधी की हत्या की साजिश के आरोपी वीर सावरकर को भारत रत्न देने की मांग करने वाली  शिवसेना को गले लगा लिया। उस शिवसेना को जिसने बावरी मस्जिद ढहाने की जिम्मेेदारी ले ली थी। बात यही नहीं खत्म होती। पांखड का सिलसिला भी पूरी शिद्दत से चलता है।कांग्रेस जिस शिवसेना को सांप्रदायिक मानती थी उसे समर्थन देकर सत्ता में हिस्सेदारी कर ली और अपने सेक्युलर चेहरे की फेस सेविंग के लिए सोनिया राहुल और प्रियंका ने शपथ समारोह से परहेज भी कर लिया। क्या ऐसा शतुरमर्गी प्रयास जनता की आंखों में धूल झोंक सकता है क्या? यह तो वक्त ही बताएगा कि सत्ता की चाशनी चखने के लिए हुए इस बेमेल गठजोड़ में शिवसेना ने क्या खोया या कांग्रेस ने क्या गवांया। लेकिन एक बात तो तय है कि राजा के बयान से शहीद उधम सिंह और शिवसेना से हाथ मिलाने पर गांधी की आत्मा जरूर रो रही होगी। जहां तक गोडसे का सवाल है तो गांधी की हत्या की बात खुद कबूली थी और उसके कारण भी बताए थे। गोडसे देशभक्त था या नहीं इस पर सहमति और असहमति हो सकती है। लेकिन यह तय है कि वह गांधी का हत्यारा था। फिर इस पर बहस का क्या मतलब है। जब जेएयू की टुकड़ा टुकड़ा गेंग की बातों का बचाव अभिव्यक्ति की आजादी कहकर होता है और उन्हें देशद्रोही के आरोपों से बचाया जा सकता है तो गोडसे को लेकर अहसमति या सहमति को लेकर बवाल क्यों? क्या अभिव्यक्ति की आजादी का दायरा सीमित और सिर्फ अपने स्वार्थों के संरक्षण के लिए है? इसलिए कांग्रेस और भाजपा सहित तमाम दल महात्मा गांधी और उनके हत्यारे गोडसे को लेकर विलाप बंद करें। ऐसी बहस से गांधी को किसी से सहानुभूति की जरूरत नहीं है। वह देश ही नहीं विश्व के महापुरूष थे, हैं, और रहेंगे। लेकिन हमारे देश में कितनों को गांधी के विचारों को आगे बढ़ाने की चिंता है? सियासी पार्टियां पहले गांधी के रास्ते पर चलकर दिखाएं तभी उनको गांधी का नाम लेने का हक बनता है।